काल की चेतना
मैं सोचता हूँ कि जिस तरह हम अपने जीवन को अलग-अलग दिनों में अनुभव करते हैं, शायद उसी तरह अस्तित्व स्वयं असंख्य चेतनाओं में अनुभव हो रहा हो।
मेरे लिए आज का दिन अलग है, कल का दिन अलग था, और आने वाला दिन अलग होगा। जब मैं दिन के भीतर हूँ, तो वह अपने आप में पूरा लगता है। उसकी अपनी घटनाएँ हैं, अपने विचार हैं, अपनी चिंताएँ हैं। लेकिन जब मैं कुछ महीनों या वर्षों बाद पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो वे दिन अलग-अलग इकाइयाँ नहीं रह जाते। वे सब मिलकर मेरे जीवन का एक हिस्सा बन जाते हैं।
यही बात मुझे चेतना के बारे में सोचने पर मजबूर करती है।
हर जीव अपने भीतर एक अलग संसार लेकर चलता है। मैं अपने अनुभव को भीतर से जानता हूँ। कोई दूसरा मनुष्य अपने अनुभव को जी रहा है। किसी पशु, पक्षी या अन्य जीव का भी अपना अनुभव-जगत होगा। बाहर से देखने पर ये सभी चेतनाएँ अलग दिखाई देती हैं। हर चेतना की अपनी सीमाएँ हैं, अपनी स्मृतियाँ हैं, अपनी इच्छाएँ हैं और दुनिया को देखने का अपना ढंग है।
लेकिन यदि देखने का पैमाना बदल जाए तो?
यदि जिस तरह मैं अपने जीवन के अनेक दिनों को एक साथ देख सकता हूँ, उसी तरह कोई व्यापक चेतना इन अनेक व्यक्तिगत चेतनाओं को एक साथ देख रही हो?
तब संभव है कि जिसे हम अलग-अलग चेतनाएँ समझते हैं, वे किसी बहुत बड़े अनुभव की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ हों। जैसे एक जीवन में अनेक दिन होते हैं, वैसे ही किसी व्यापक सत्ता में असंख्य चेतनाएँ हो सकती हैं।
यह विचार मुझे श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय की ओर ले जाता है, जहाँ अर्जुन को विश्वरूप का दर्शन होता है।
अर्जुन सामान्य दृष्टि से युद्धभूमि को देख रहा था। उसके सामने अपने लोग थे, अपने संबंध थे, अपने भय थे और अपने निर्णय थे। उसकी दृष्टि एक व्यक्ति की दृष्टि थी।
लेकिन विश्वरूप में उसे कुछ और दिखाई देता है।
वह अनेक रूपों को एक ही रूप में देखता है। अनेक प्राणियों को एक ही व्यापक सत्ता के भीतर देखता है। उत्पत्ति और विनाश भी उसी के भीतर घटते दिखाई देते हैं। जो सामान्य दृष्टि में अलग-अलग हैं, वे वहाँ एक ही विशाल वास्तविकता के भीतर उपस्थित हैं।
और उसी अध्याय में कृष्ण कहते हैं—
कालोऽस्मि।
मैं काल हूँ।
यह वाक्य मुझे हमेशा समय के सामान्य अर्थ से बड़ा लगता है।
हम समय को अक्सर एक रेखा की तरह देखते हैं—जो बीत रहा है। सुबह से शाम, जन्म से मृत्यु, एक युग से दूसरे युग तक। लेकिन यदि काल केवल घटनाओं के बीच की दूरी न हो? यदि काल स्वयं वह व्यापक सत्ता हो जिसके भीतर घटनाएँ, जीवन और चेतनाएँ प्रकट हो रही हैं?
तब एक और प्रश्न उठता है।
क्या हम काल को अनुभव कर रहे हैं, या हमारी चेतना स्वयं काल के अनुभव का एक हिस्सा है?
हम सामान्यतः कहते हैं कि मैं समय के भीतर जी रहा हूँ। मैं बूढ़ा हो रहा हूँ। समय मेरे जीवन को बदल रहा है। लेकिन शायद इसे उलटकर भी देखा जा सकता है।
शायद काल हमारे बाहर बहने वाली कोई वस्तु भर नहीं है।
शायद हमारे जन्म, हमारे विचार, हमारी इच्छाएँ, हमारे अनुभव और हमारी मृत्यु—सब काल की व्यापक अभिव्यक्ति का हिस्सा हैं।
यदि ऐसा है, तो प्रत्येक चेतना किसी विशाल अनुभव का एक बिंदु हो सकती है।
मैं अपने भीतर से केवल अपने अनुभव को जानता हूँ, इसलिए मुझे अपनी चेतना स्वतंत्र दिखाई देती है। ठीक वैसे ही जैसे किसी एक दिन के भीतर खड़े होकर वह दिन स्वयं में पूर्ण दिखाई देता है।
लेकिन जीवन की दृष्टि से वह केवल एक दिन है।
क्या हमारी व्यक्तिगत चेतना भी किसी और बड़े स्तर पर ऐसी ही हो सकती है?
हम स्वयं को अलग देखते हैं। मैं और तुम अलग हैं। एक मनुष्य और दूसरा मनुष्य अलग हैं। एक जीव और दूसरा जीव अलग हैं। यह भेद हमारे अनुभव के स्तर पर वास्तविक है।
लेकिन क्या कोई ऐसा दृष्टिकोण हो सकता है जहाँ ये सभी चेतनाएँ एक साथ दिखाई देती हों?
विश्वरूप की कल्पना शायद इसी संभावना की ओर संकेत करती है।
अर्जुन को केवल अनेक वस्तुओं का दृश्य नहीं मिलता। उसे कुछ समय के लिए एक ऐसी दृष्टि मिलती है जिसमें उसका व्यक्तिगत दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं रह जाता। उसे जो अलग-अलग दिखाई देता था, वह किसी बड़ी एकता के भीतर दिखाई देने लगता है।
शायद हममें से प्रत्येक अपने अनुभव की एक छोटी खिड़की से अस्तित्व को देख रहा है।
और यदि काल की कोई चेतना है, तो शायद उसके लिए ये सभी खिड़कियाँ अलग नहीं हैं।
वह सभी को देख रही है।
या शायद उससे भी अधिक—वह स्वयं इन सभी के माध्यम से देख रही है।
तब यह कहना भी अधूरा हो सकता है कि काल सभी चेतनाओं को देखता है।
शायद प्रत्येक चेतना काल की ही एक दृष्टि है।
एक स्थान से अस्तित्व स्वयं को एक मनुष्य के रूप में अनुभव कर रहा है। कहीं किसी पशु के रूप में। कहीं किसी अन्य जीवन के रूप में। हर अनुभव सीमित है, लेकिन सभी अनुभव किसी एक व्यापक वास्तविकता के भीतर घट रहे हैं।
यदि ऐसा है, तो विश्वरूप का अर्थ केवल एक विराट आकृति देख लेना नहीं रह जाता।
वह शायद दृष्टि के पैमाने का परिवर्तन है।
व्यक्ति से समष्टि की ओर।
एक अनुभव से असंख्य अनुभवों की ओर।
एक जीवन से उस वास्तविकता की ओर जिसमें अनेक जीवन एक साथ उपस्थित हैं।
और शायद इसी कारण विश्वरूप भयावह भी है।
व्यक्तिगत चेतना अपने छोटे पैमाने पर दुनिया को समझ सकती है। वह संबंधों, घटनाओं और कारणों को सीमित रूप में देखती है। लेकिन जब उसे उस संपूर्णता का आभास होता है जिसमें सृजन और विनाश दोनों एक साथ उपस्थित हैं, तो उसकी सामान्य समझ पर्याप्त नहीं रहती।
शायद काल की चेतना भी कुछ ऐसी ही होगी।
उसके लिए जन्म और मृत्यु दो पूर्णतः अलग घटनाएँ नहीं होंगी। जैसे हमारे लिए सुबह और रात एक ही दिन के दो हिस्से हैं, वैसे ही उसके लिए सृजन और विनाश किसी बहुत बड़े प्रवाह के दो पहलू हो सकते हैं।
और तब शायद हमारा सबसे मूल प्रश्न बदल जाता है।
प्रश्न यह नहीं रह जाता कि मेरी चेतना कहाँ से आई।
प्रश्न यह हो जाता है—
वह कौन-सी चेतना है जिसमें मेरी चेतना प्रकट हो रही है?
और यदि वह काल है, तो शायद हम केवल काल में नहीं जी रहे।
शायद हम स्वयं काल की चेतना में उठती हुई एक अनुभूति हैं।