जन्म और मृत्यु के बीच जो समय हमें मिलता है, शायद वही जीवन है। यह समय जितना लंबा होता है, चेतना उतने ही अधिक अनुभवों से गुजर सकती है। संबंध, भय, प्रेम, हानि, इच्छा, प्रतीक्षा, संघर्ष, समझ, भूल, स्मृति—धीरे-धीरे एक जीवन के भीतर अनुभवों की एक पूरी दुनिया बनती जाती है। लेकिन यदि जन्म और […]
सृष्टि समय के भीतर उत्पन्न नहीं हुई है। वह स्वयं समय के गर्भ से उत्पन्न हुई है। और शायद जब यह सृष्टि अपने वर्तमान रूप में समाप्त होगी, तब वह कहीं बाहर नहीं जाएगी। वह उसी समय के गर्भ में वापस चली जाएगी, जहाँ से वह आई थी। इसे समझने के लिए पृथ्वी को कुछ […]
सृजन के पहले का विराम समय के भीतर नृत्य — IX पिछले निबंध में मैं इस विचार के साथ ठहरा था कि कल्पना भी नृत्य में हमारी एक गति है। किसी भविष्य को रूप देने से पहले ही उसकी छवि हमारे ध्यान, निर्णयों और प्रयासों को प्रभावित करने लगती है। हम जिस संभावना की ओर […]
पिछले निबंध में मैं इस प्रश्न पर विचार कर रहा था कि जब जिज्ञासा अपनी ही गति की ओर मुड़ती है, तो क्या होता है। अधिक शांत होने या अपने भीतर स्पष्टता पाने की इच्छा भी भविष्य की एक छवि बना सकती है—एक और मंज़िल, जिसकी ओर हम बढ़ने लगते हैं। एक और प्रश्न मन […]
बचपन में हमारा संसार हमारे बहुत पास से शुरू होता है। पालना है, कमरा है, कोई परिचित चेहरा है। कुछ समय तक हम लगभग इतना ही जानते हैं। फिर दूसरे कमरे से कोई आवाज़ आती है। कोई दरवाज़े के पार चला जाता है। हम उसके पीछे जाना चाहते हैं। जिज्ञासा क्या है, यह समझने से […]
मानव इतिहास में तकनीक ने बार-बार हमारी क्षमताओं का विस्तार किया है। पहिए ने गति बढ़ाई। औज़ारों ने शक्ति बढ़ाई। दूरबीन ने दृष्टि का विस्तार किया। टेलीफोन ने आवाज़ को दूरी के पार पहुँचा दिया। इंटरनेट ने हमारी उपस्थिति को भौतिक स्थान से बहुत आगे तक फैला दिया। लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ शायद कुछ […]
मनुष्य धीरे-धीरे भौतिक उपस्थिति से आगे किसी अधिक सूक्ष्म प्रकार की उपस्थिति की ओर बढ़ रहा है। यह परिवर्तन अचानक नहीं है। शायद इतना धीमा है कि हम उसे किसी एक क्षण में पहचान भी नहीं सकते। लेकिन यदि हम अपने दैनिक जीवन को ध्यान से देखें, तो उसके संकेत हर जगह दिखाई देते हैं। […]
डिजिटल संसार, शोर और एकांत पर एक चिंतन भीड़ को हम सामान्यतः एक भौतिक स्थिति के रूप में देखते हैं। किसी सड़क, बाज़ार, रेलवे स्टेशन या सार्वजनिक स्थान पर जब लोगों की संख्या बढ़ जाती है, तो वह जगह धीरे-धीरे भीड़भाड़ वाली लगने लगती है। रास्ते सीमित हो जाते हैं, आवाज़ें एक-दूसरे में मिलने लगती […]
जीवन के कुछ रूप ऐसे होते हैं जिन पर हम इतना निर्भर होते हैं कि धीरे-धीरे उन्हें देखना ही बंद कर देते हैं। उनकी उपस्थिति सामान्य लगने लगती है, उनका योगदान स्वाभाविक मान लिया जाता है, और वे क्या देते हैं यह अधिक दिखाई देता है, वे स्वयं क्या हैं यह कम। महाभारत के सौप्तिकपर्व […]
पिछले कुछ समय से मेरे भीतर समय को लेकर एक विचार बार-बार उठ रहा है।मुझे ऐसा नहीं लगता कि समय स्वयं बदल रहा है। दिन आज भी चौबीस घंटे का है, वर्ष की अवधि भी वही है। फिर भी समय के बीतने का अनुभव पहले जैसा नहीं लगता।शायद परिवर्तन समय में नहीं, समय को अनुभव […]