कर्म का समय
मैं सोचता हूँ कि यदि मैं हर दिन अपने जीवन के बारे में कुछ लिखूँ, तो शुरुआत में शायद हर दिन अपने आप में महत्वपूर्ण लगेगा। आज क्या हुआ, मैंने क्या सोचा, क्या सीखा, किस बात ने मुझे परेशान किया, किस बात ने मुझे प्रसन्न किया—हर दिन का अपना एक आकार होगा।
लेकिन यदि यही लिखना लगातार चलता रहे, तो कुछ महीनों बाद शायद मेरी दृष्टि बदलने लगेगी। तब मैं हर दिन को अलग-अलग नहीं देखूँगा। मैं पीछे मुड़कर यह समझना चाहूँगा कि पिछले तीन या चार महीनों में मेरे भीतर क्या बदला। किन बातों को मैं बार-बार सोचता रहा। किन चीज़ों के पीछे भागता रहा। किन बातों से धीरे-धीरे दूर होता गया।
एक वर्ष पूरा होने पर शायद दिन और भी छोटे हो जाएँ। तब संभव है कि मैं जनवरी के किसी एक दिन या मार्च की किसी एक घटना को न देखूँ। मैं पूछूँ कि इस पूरे वर्ष में मैंने क्या किया। मैंने क्या समझा। मेरी दिशा क्या रही।
फिर यदि यह क्रम कई वर्षों तक चलता रहे, तो शायद महीनों का महत्व भी कम हो जाए। दो या तीन वर्षों को देखते हुए मैं यह जानना चाहूँगा कि उन वर्षों ने मुझे किस तरह बदला। दस वर्षों बाद शायद अलग-अलग वर्ष भी उतने महत्वपूर्ण न रहें। तब प्रश्न और बड़ा हो सकता है—इन दस वर्षों में मेरा जीवन किस दिशा में गया?
यदि मनुष्य सौ वर्षों तक इसी तरह अपने जीवन को दर्ज करता रहे, तो शायद जीवन के अंतिम वर्षों में वह हर दशक का भी अलग-अलग हिसाब न करे। संभव है कि वह पहले पचास वर्षों और अगले पचास वर्षों को दो बड़े प्रवाहों की तरह देखे। उसने क्या चाहा, किन बातों से बँधा, क्या खोया, क्या समझा और अंततः किस ओर बढ़ा।
अब कल्पना कीजिए कि जीवन सौ वर्ष का नहीं, पाँच सौ या हज़ार वर्ष का हो।
हज़ार वर्ष जीने वाला कोई व्यक्ति शायद अपने जीवन को वर्षों में भी नहीं देखेगा। उसके लिए हजारों दिन, सैकड़ों महीने और अनेक दशक एक-दूसरे में घुल चुके होंगे। घटनाएँ स्मृति में होंगी, लेकिन उसका आकलन घटनाओं के आधार पर नहीं होगा। वह शायद केवल यह देखेगा कि इतने विशाल समय में उसकी गति क्या रही।
शायद कर्म को भी इसी तरह देखा जा सकता है।
हम सामान्यतः कर्म को किसी एक कार्य से जोड़ते हैं। मैंने आज क्या किया। कौन-सा निर्णय लिया। किसके साथ कैसा व्यवहार किया। कौन-सा कर्म अच्छा था और कौन-सा बुरा। यह दृष्टि गलत नहीं है, क्योंकि जीवन वास्तव में इन्हीं छोटे कार्यों से बनता है। लेकिन संभव है कि कर्म का अर्थ केवल किसी एक घटना का हिसाब न हो।
जिस प्रकार हजारों दिन मिलकर एक जीवन की दिशा बनाते हैं, उसी प्रकार असंख्य कर्म मिलकर किसी चेतना की दिशा बनाते होंगे।
एक दिन शायद निर्णायक नहीं होता, लेकिन हर दिन किसी दिशा में एक छोटा कदम अवश्य होता है। एक विचार शायद बहुत बड़ा नहीं होता, लेकिन बार-बार वही विचार लौटे तो वह प्रवृत्ति बन जाता है। एक इच्छा क्षणिक हो सकती है, लेकिन वही इच्छा लगातार बनी रहे तो वह हमारे निर्णयों को आकार देने लगती है। इसी तरह कर्म शायद केवल वह नहीं जो हमने किया, बल्कि वह भी है जिसकी ओर हम बार-बार बढ़ते रहे।
यदि पुनर्जन्म की भारतीय अवधारणा को इसी दृष्टि से देखें, तो विचार और बड़ा हो जाता है।
तब एक जन्म अपने आप में सम्पूर्ण कहानी न होकर किसी बहुत लंबी यात्रा का एक छोटा अंश हो सकता है। जिस प्रकार एक वर्ष को समझने के लिए हर दिन का हिसाब आवश्यक नहीं, शायद उसी प्रकार चेतना की बहुत लंबी यात्रा को समझने के लिए प्रत्येक जन्म की प्रत्येक घटना निर्णायक नहीं होगी।
हो सकता है कि एक बड़े समय-पैमाने पर प्रश्न यह न हो कि किसी एक जन्म में हमारे साथ क्या हुआ।
प्रश्न यह हो कि जन्मों के बीच हमारी दिशा क्या रही।
हम किससे बँधते गए। किन इच्छाओं को बार-बार पोषित किया। किन भय को अपने साथ लेकर चलते रहे। किन बातों को छोड़ना सीखा। हमारे कर्म हमें किस प्रकार की चेतना की ओर ले जाते रहे।
इस दृष्टि से कर्म किसी ब्रह्मांडीय लेखा-पुस्तक की तरह कम और एक दीर्घकालिक गति की तरह अधिक दिखाई देता है।
एक नदी के किसी एक मोड़ को देखकर उसकी पूरी दिशा नहीं समझी जा सकती। लेकिन बहुत दूर से देखने पर दिखाई देता है कि वह किस ओर बह रही है।
शायद जीवन भी ऐसा ही है।
हम दिन के भीतर रहते हुए दिन को बहुत बड़ा समझते हैं। एक घटना हमें निर्णायक लगती है। एक सफलता अत्यधिक महत्वपूर्ण लगती है। एक असफलता अंतिम लग सकती है। लेकिन समय का पैमाना बदलते ही उनका आकार भी बदल जाता है।
वर्ष के सामने दिन छोटा हो जाता है।
दशक के सामने वर्ष छोटा हो जाता है।
जीवन के सामने दशक छोटा हो जाता है।
और यदि चेतना की यात्रा वास्तव में जन्मों तक फैली हुई है, तो शायद एक पूरा जीवन भी उतना ही छोटा हो जाए जितना आज हमें बीता हुआ एक दिन दिखाई देता है।
तब कर्म को समझने का प्रश्न भी बदल जाता है।
यह केवल यह पूछना नहीं रह जाता कि मैंने क्या किया।
शायद वास्तविक प्रश्न यह है—
मैं किस दिशा में जा रहा हूँ?