सृष्टि की अंतिम स्मृति
सृष्टि समय के भीतर उत्पन्न नहीं हुई है। वह स्वयं समय के गर्भ से उत्पन्न हुई है।
और शायद जब यह सृष्टि अपने वर्तमान रूप में समाप्त होगी, तब वह कहीं बाहर नहीं जाएगी। वह उसी समय के गर्भ में वापस चली जाएगी, जहाँ से वह आई थी।
इसे समझने के लिए पृथ्वी को कुछ समय के लिए एक अंतरिक्ष यान की तरह देखा जा सकता है।
एक ऐसा यान जो बहुत लंबी यात्रा पर है।
इस यान पर असंख्य जीव जन्म लेते हैं, कुछ समय रहते हैं, अनुभव करते हैं और फिर चले जाते हैं। लेकिन शायद इस यात्रा के यात्रियों को अपनी पूरी स्मृति उपलब्ध नहीं है। उन्हें यह नहीं पता कि यात्रा कहाँ से शुरू हुई, कहाँ समाप्त होगी और वे स्वयं इस यात्रा में वास्तव में कौन हैं।
मानो हम सभी किसी प्रकार के हाइबरनेशन में हों।
हम जाग रहे हैं, लेकिन पूरी तरह जाग्रत नहीं हैं।
हम अपने शरीर को जानते हैं। अपने वर्तमान जीवन को जानते हैं। कुछ वर्षों की स्मृतियाँ अपने भीतर रखते हैं। इच्छाएँ हैं, भय हैं, संबंध हैं, संघर्ष हैं।
लेकिन संभव है कि चेतना का एक बहुत बड़ा भाग हमारे लिए अभी भी अंधकार में हो।
जिसे हम अवचेतन कहते हैं, शायद वह केवल मन का दबा हुआ हिस्सा नहीं है। वह उस विस्मृति का भी प्रतीक हो सकता है जिसके भीतर यह पूरी यात्रा संभव होती है।
क्योंकि यदि हमें प्रारंभ से ही सब कुछ याद होता तो शायद यह यात्रा वैसी नहीं रहती जैसी अभी है।
यदि मनुष्य को जन्म लेते ही पता होता कि वह कौन है, कहाँ से आया है, उसे कहाँ जाना है और इस पूरे नृत्य का अंत क्या है, तो उसके चुनाव, उसकी आकांक्षाएँ और उसके अनुभव भी बदल जाते।
शायद कुछ चीज़ों को अनुभव करने के लिए उन्हें पहले भूलना आवश्यक होता है।
सृष्टि की यह विस्मृति ही शायद उसके अनुभव की संभावना है।
प्रत्येक जीव किसी छोटे से द्वार की तरह है जिसके माध्यम से सृष्टि स्वयं को अनुभव करती है।
एक जीवन में वह प्रेम का अनुभव करती है।
किसी दूसरे में भय का।
कहीं सत्ता का।
कहीं असहायता का।
कहीं जन्म का।
कहीं मृत्यु का।
कहीं मनुष्य के रूप में।
कहीं पशु के रूप में।
कहीं वृक्ष के रूप में।
असंख्य चेतनाएँ, असंख्य अनुभव और असंख्य स्मृतियाँ।
लेकिन यदि इन सभी चेतनाओं का कोई गहरा मूल एक ही है, तो संभव है कि इन सबके अनुभव कहीं न कहीं उसी मूल चेतना में लौटते हों।
तब काल केवल घटनाओं को मापने वाला समय नहीं रह जाता।
काल वह विशाल चेतना भी हो सकता है जिसमें सभी अनुभव एकत्र होते जाते हैं।
हममें से प्रत्येक जिस जीवन को अपना व्यक्तिगत जीवन मानता है, वह शायद उस विशाल अनुभव का केवल एक अंश है।
हम देखते हैं।
जीते हैं।
इच्छा करते हैं।
गलतियाँ करते हैं।
खोते हैं।
पाते हैं।
और जो कुछ भी हमारे भीतर घटता है, वह कहीं न कहीं सृष्टि के अनुभव में जुड़ता चला जाता है।
तब एक प्रश्न उठता है।
यह यात्रा कब समाप्त होगी?
शायद तब नहीं जब पृथ्वी नष्ट हो जाए।
शायद तब भी नहीं जब कोई तारा बुझ जाए या कोई ब्रह्मांड अपने वर्तमान रूप को खो दे।
संभव है कि यात्रा तब पूर्ण हो जब सृष्टि ने स्वयं को पूरी तरह अनुभव कर लिया हो।
जब जिन संभावनाओं को अनुभव किया जाना था, वे अनुभव हो चुकी हों।
जब जो स्मृतियाँ सुप्त थीं, वे जाग चुकी हों।
जब चेतना के भीतर ऐसा कुछ न बचा हो जिसे अभी जाना जाना शेष हो।
तब शायद वह अवस्था आएगी जिसे हम जागरण कह सकते हैं।
यह किसी एक व्यक्ति का जागरण नहीं होगा।
यह स्वयं सृष्टि का जागरण होगा।
मानो अंतरिक्ष यान अपने गंतव्य के पास पहुँच रहा हो और धीरे-धीरे उसके सभी यात्री हाइबरनेशन से बाहर आने लगें।
जो सोए हुए थे, वे जागने लगें।
जो भूला हुआ था, वह स्मरण होने लगे।
जो अलग-अलग दिखाई दे रहा था, वह अपने मूल को पहचानने लगे।
और जैसे-जैसे यह जागरण पूर्ण होगा, शायद वही संसार जिसे हम इतना वास्तविक और स्थायी मानते हैं, अपनी आवश्यकता खोने लगेगा।
क्योंकि जिस कारण से यह नृत्य चल रहा था, वह कारण ही पूरा हो चुका होगा।
तब सृष्टि का अंत विनाश जैसा नहीं होगा।
वह पूर्णता जैसा होगा।
जैसे कोई लंबी यात्रा अपने गंतव्य तक पहुँचती है।
जैसे कोई कथा अपनी अंतिम पंक्ति तक पहुँचती है।
जैसे कोई नृत्य तब रुकता है जब उसकी अंतिम लय पूरी हो जाती है।
और तब यह पूरी सृष्टि पुनः काल में लौट सकती है।
उस समय तक काल सब कुछ देख चुका होगा।
सभी आँखों से।
सभी जीवनों से।
सभी स्मृतियों से।
सभी आकांक्षाओं से।
वह वह सब जान चुका होगा जिसे सृष्टि के माध्यम से जाना जा सकता था।
फिर शायद मौन होगा।
लेकिन वह अंतिम मौन भी अंतिम नहीं होगा।
क्योंकि यदि सृष्टि एक बार काल के गर्भ से उत्पन्न हुई है, तो संभव है कि उसी मौन से फिर कोई नई गति जन्म ले।
एक नई सृष्टि।
नई चेतनाएँ।
नई विस्मृति।
नई आकांक्षाएँ।
और फिर एक नई यात्रा।
शायद यही क्रम चलता रहता है—
काल से सृष्टि।
सृष्टि से अनुभव।
अनुभव से स्मृति।
स्मृति से जागरण।
जागरण से लय।
और लय से पुनः काल।
तब सृष्टि का अंत वह क्षण नहीं होगा जब सब कुछ नष्ट हो जाएगा।
शायद सृष्टि का अंत वह क्षण होगा—
जब कुछ भी भूलने के लिए शेष नहीं रहेगा।