जब जिज्ञासा भीतर मुड़ती है
बचपन में हमारा संसार हमारे बहुत पास से शुरू होता है।
पालना है, कमरा है, कोई परिचित चेहरा है। कुछ समय तक हम लगभग इतना ही जानते हैं। फिर दूसरे कमरे से कोई आवाज़ आती है। कोई दरवाज़े के पार चला जाता है। हम उसके पीछे जाना चाहते हैं।
जिज्ञासा क्या है, यह समझने से बहुत पहले हम किसी चीज़ की ओर बढ़ने लगते हैं।
जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमारे संसार की सीमा भी आगे बढ़ती जाती है। हम घर से बाहर निकलना चाहते हैं, गली में घूमना चाहते हैं, दोस्तों के साथ समय बिताना चाहते हैं। परिवार ने जिस जीवन से हमारा परिचय कराया था, उसके आगे दूसरे लोगों के जीवन और संसार को देखने के नए ढंग खुलने लगते हैं। हमें पता चलने लगता है कि परिचित दुनिया के बाहर कितना कुछ है।
फिर किसी दिन कोई दूसरा शहर बुलाने लगता है। शायद कोई दूसरा देश। हम किसी अनजानी जगह पढ़ने, नए लोगों के बीच काम करने और यह जानने की कल्पना करते हैं कि ऐसी जगह हम क्या बन सकते हैं, जहाँ कोई हमारा नाम तक नहीं जानता।
हर पड़ाव एक नया क्षितिज खोल देता है।
इस यात्रा में एक सुंदरता है। हम जिसे समझते हैं, उसे छोड़कर किसी ऐसी चीज़ की ओर बढ़ते हैं जिसकी पूरी कल्पना भी अभी नहीं कर सकते। कोई अपरिचित जगह हमें फिर से ध्यान देना सिखाती है। जिन बातों को हम आदतन देखते आए थे, उनकी जगह अब नई चीज़ें हैं, जिन्हें समझना है। हमें पता चलता है कि हम जितना सोचते थे, उससे कहीं अधिक देख सकते हैं।
जब हम आकाश की ओर देखते हैं, तो यही इच्छा एक और विस्तार पा लेती है। अब कमरे की जगह पूरा ग्रह है। उसके आगे दूसरे संसार हैं, दूर के तारे हैं, ऐसी संभावनाएँ हैं जो किसी एक मनुष्य के जीवन से कहीं आगे तक जाती हैं। जिस घर में हमारा पूरा इतिहास बीता है, वह एक ऐसी यात्रा का एक पड़ाव दिखाई देने लगता है जिसकी कल्पना हमने अभी शुरू ही की है।
फिर भी, उन दूरियों की ओर देखने वाले व्यक्ति के भीतर भी बहुत कुछ है जिसे जानना अभी बाकी है।
संसार से हर मुलाक़ात हमारे भीतर कोई हलचल पैदा करती है। कोई दृश्य एक स्मृति जगा देता है। कोई अपरिचित आवाज़ हमारा ध्यान खींचती है। किसी दूर की जगह का विचार, उसकी ओर पहला कदम उठाने से पहले ही, हमारे भीतर उत्साह भर देता है।
हम जिससे मिलते हैं, उसके बारे में जिज्ञासु होते हैं। उस मुलाक़ात के दौरान अपने भीतर होने वाले अनुभव के बारे में भी जिज्ञासु हो सकते हैं।
जब कोई चीज़ मुझे परिचित संसार से आगे बुलाती है, तब मेरे भीतर क्या होता है?
यह प्रश्न तब भी उठ सकता है जब जीवन संभावनाओं से भरा हुआ लगे। हमें यात्रा से प्रेम हो सकता है और साथ ही यात्रा करने वाले को जानने में भी रुचि हो सकती है। जो जिज्ञासा हमारा ध्यान तारों की ओर ले जाती है, वही किसी विचार, किसी अनुभूति या चुपचाप आकार लेती इच्छा की ओर भी मुड़ सकती है।
भीतर की यात्रा इसी आश्चर्य से शुरू हो सकती है।
यहाँ मैं योगी की कल्पना ऐसे व्यक्ति के रूप में कर रहा हूँ जो इस संभावना पर अपना ध्यान टिकाता है। चुपचाप बैठे हुए भी देखने के लिए बहुत कुछ है। कोई आवाज़ सुनाई देती है। ध्यान उसकी ओर जाता है। एक स्मृति उभरती है। उससे जुड़ी कोई और बात याद आती है, और शायद कुछ करने का आवेग भी उठता है।
शरीर एक जगह रहता है, फिर भी भीतर एक पूरा क्रम चलता रहता है।
आमतौर पर विचार हमारे सामने जो रखता है, हम उसी में खो जाते हैं। किसी की याद आती है और हम उसके साथ अपने संबंध की कहानी में पहुँच जाते हैं। किसी जगह की कल्पना करते हैं और वहाँ पहुँचने के रास्ते सोचने लगते हैं। भीतर ध्यान देने पर हम देख पाते हैं कि ये हलचलें कैसे शुरू होती हैं और कैसे एक से दूसरी जन्म लेती है।
कहीं और जाने की इच्छा का भी हमारे भीतर अपना एक जीवन होता है।
वह किसी क्षणिक छवि से शुरू हो सकती है। हम बार-बार उसकी ओर लौटते हैं, उसमें नई बातें जोड़ते हैं, स्वयं को वहाँ देखते हैं। धीरे-धीरे उस संभावना से हमारा भावनात्मक जुड़ाव बनने लगता है। जिस जगह हम कभी गए भी नहीं, वह उस जगह के प्रति हमारे भाव बदलने लगती है जहाँ हम अभी रहते हैं।
यहाँ दूरी, काल से जुड़ने लगती है।
कोई दूसरी जगह जीवन के किसी आने वाले क्षण का प्रतीक बन सकती है: वह दिन जब हम एक अलग जीवन शुरू करेंगे, कहीं अपनापन पाएँगे या वह व्यक्ति बन जाएँगे जिसकी हमने कल्पना की है। वहाँ पहुँचने की आशा उस जगह को पहले ही एक अर्थ दे देती है।
कभी यह आशा हमारे वर्तमान जीवन को समृद्ध करती है। वह प्रयास को दिशा देती है और तैयारी में आनंद भरती है। कभी हमारी इतनी आशाएँ भविष्य के किसी पड़ाव पर टिक जाती हैं कि जो जीवन अभी हमारे आसपास है, उसकी कद्र करना कठिन होने लगता है।
भीतर मुड़ना हमें इस अंतर को देखने में मदद करता है।
हम अपने भीतर किसी अपरिचित संसार को जानने की सच्ची इच्छा के साथ यह अपेक्षा भी पा सकते हैं कि वहाँ पहुँचकर हमारे भीतर की कोई उलझन सुलझ जाएगी। एक ही यात्रा में दोनों साथ हो सकते हैं। उन्हें ध्यान से देखने पर हम समझने लगते हैं कि जिन जगहों तक पहुँचना चाहते हैं, उनसे वास्तव में क्या माँग रहे हैं।
यह समझ उन जगहों को देखने का हमारा ढंग भी बदल सकती है जिन्हें हम पहले से जानते हैं।
किसी परिचित गली में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती हैं जिन पर हमने वर्षों पहले ध्यान देना छोड़ दिया था। परिवार के किसी सदस्य का अपना एक भीतरी संसार है, जिसके बारे में हमारी बनी-बनाई धारणा हमें बहुत कम बताती है। किसी समुदाय की अपनी कहानियाँ, संबंध और एक-दूसरे की देखभाल के ढंग होते हैं। हमारे ध्यान देने से बहुत पहले से वे वहाँ मौजूद हैं।
परिचय के बावजूद बहुत कुछ अनदेखा रह सकता है।
शायद इससे लौटने का एक ऐसा अर्थ खुलता है जो केवल किसी जगह वापस जाने तक सीमित नहीं है। हम अपना ध्यान लौटाकर भी किसी चीज़ के पास आ सकते हैं। उसे फिर से देख सकते हैं, इस बार यह मानकर नहीं कि हम उसे पहले से जानते हैं। घर से दूर रहते हुए भी हम उसे अधिक गहराई से समझने लग सकते हैं। अपनी जगह रहते हुए भी जान सकते हैं कि हमने कितना कम देखा है।
दोबारा देखने पर वे संबंध अधिक स्पष्ट होने लगते हैं जिन्होंने हमें सँभाला है। हमारे जीवन ने एक परिवार, एक समुदाय, एक देश और इन सबको समेटे पृथ्वी के जीवन के भीतर आकार लिया है।
पृथ्वी को माँ मानने का अर्थ, मेरे लिए, यह पहचानना है कि हमारा अस्तित्व कितनी गहराई से उसी से जुड़ा है। दूसरे ग्रहों तक ले जाने वाली हमारी कल्पना ने भी यहीं आकार लिया है। यात्रा पर निकलने वाला शरीर अपने उद्गम की छाप साथ लेकर चलता है।
खोज और अपनापन साथ-साथ गहरे हो सकते हैं। हम पृथ्वी से आगे देख सकते हैं और साथ ही उसके साथ अपने संबंध के प्रति अधिक सजग हो सकते हैं। अपरिचित लोगों के जीवन को जानते हुए हम अपने सबसे निकट के लोगों पर अधिक ध्यान देना भी सीख सकते हैं।
स्वयं की ओर मुड़ना ध्यान के इसी विस्तार का हिस्सा है।
हम जहाँ भी गए, स्वयं को साथ लेकर गए। फिर भी हमारा अपना अनुभव हमारे लिए कुछ हद तक अपरिचित बना रहता है। हम अपनी कुछ आदतें, पसंद और अपने बारे में कुछ कहानियाँ जानते हैं। इस परिचय के नीचे विचार अब भी हमें चकित करते हैं। भावनाएँ बदलती हैं। जो आवेग कुछ देर पहले बहुत प्रबल लग रहा था, उसका ज़ोर कम हो जाता है। जिसे हम नाम नहीं दे पा रहे थे, वह धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगता है।
इन छोटे-छोटे परिवर्तनों में काल की अनुभूति होने लगती है।
कोई स्मृति वर्तमान में आकर उसका भाव बदल देती है। भविष्य की कोई कल्पना उत्साह या भय जगा देती है। हम देखते हैं कि जो बीत चुका है और जो हो सकता है, दोनों हमारे अभी के अनुभव को आकार दे रहे हैं।
सृजन और विलय के माध्यम से जिस नृत्य पर हमने विचार किया था, उसे किसी साधारण क्षण के बदलते रूपों में भी देखा जा सकता है।
साक्षीभाव पर लिखे पहले के निबंध में मैंने सोचा था कि जब हम नृत्य में अपनी ओर से एक और भंगिमा जोड़ना रोक देते हैं, तब क्या दिखाई देने लगता है। यहाँ वही विराम जिज्ञासा को अपनी गति देखने का अवसर देता है। हम ध्यान देने लगते हैं कि हम किसी चीज़ की ओर कैसे बढ़ते हैं, क्या हमें खींचता है और क्या होता है जब हम किसी अनुभव के साथ इतनी देर ठहरते हैं कि उसे बदलते हुए देख सकें।
स्वयं को समझने की इच्छा भी इसी गति का हिस्सा है। हम भविष्य के अपने किसी ऐसे रूप की कल्पना कर सकते हैं जिसमें हम पूरी तरह शांत हों या जिसमें हमारी समझ पूरी तरह स्पष्ट हो। वह छवि भी एक और क्षितिज बन सकती है। उसे भी देखा जा सकता है।
संसार हमें ऐसे अनुभव देता है जो स्वयं के बारे में हमारी समझ बदल देते हैं। स्वयं पर ध्यान देने से हम समझने लगते हैं कि हम संसार से किस तरह मिलते हैं। हम यात्रा करते हैं, लौटते हैं, फिर से देखते हैं और हर बार कुछ ऐसा पाते हैं जो हमारी पहले की दृष्टि में समा नहीं पाया था।
दरवाज़े पर खड़ा बच्चा जानना चाहता था कि दूसरे कमरे में क्या हो रहा है।
वही जिज्ञासा हमें समुद्रों के पार और शायद किसी दिन दूर के तारों तक ले जा सकती है। वह हमें किसी ऐसे शांत क्षण तक भी पहुँचा सकती है जिसमें कहीं जाने की इच्छा स्वयं हमारी जिज्ञासा का विषय बन जाए।
जहाँ से हर यात्रा शुरू होती है, उस जगह को जानने की यात्रा भी जारी है।